मुरझा ही था जाना कभी, तो खिले थे ही क्यूँ?
मिले ही किस वास्ते हम, अगर बिछड़ना ही था यूँ?
मंज़िलें थीं ही जब अलग, तो इन रास्तों को क्यूँ था जुड़ जाना?
बेवकूफ़ ये घोंसला दिल लगा बैठा, परिंदे को किसी दिन था ही उड़ जाना।
साथ छूटना ही था आंधी में, तो आई ही क्यूँ ये बहार?
मुस्कुराहटें लुटाकर ही भागना था, तो क्यूँ करायी आंसुओं की नैया पार?
अगर इतना ही दूर था जाना, तो आना ही क्यूँ दिल के इतने पास?
उम्मीदें तोड़नी ही थीं अगर, तो क्यूँ दिलाना इस पागल दिल को आस?
किस्मत में थीं सिर्फ काली रातें, तो काश कभी चाँद नज़र आया ही न होता।
रह जाने थे सिर्फ़ ग़म और बेचैनी, तो काश सुख-चैन हमने कभी पाया ही न होता।
शीशे का टुकड़ा है ये दिल, बेचारे को कौन समझाए यार?
टूटने की हिम्मत है नहीं, तो क्यूँ करते तुम पत्थर से प्यार?
अगर तन्हाई ही थी नसीब में, तो किस मतलब की थी वो बातें, वो मुलाकातें?
शायद यही, कि उन यादों की ओढ़ में गुज़र जाएंगी सर्दियों की लम्बी, काली रातें।
आज भी आस रखती हैं तुम्हें देखने की, इस बंजारे दिल की निगाहें
घर दिखता है उसे सिर्फ तुझमें, चाहे तुम ना ही खोलो अपनी बाहें।
वो लम्हे, वो बातें, वो आंसू और वो मुस्कानें -
हर अंधेरी रात में, ये रहेंगी मेरे सिरहाने।
मुसाफ़िर है अगर दिल ये, तो वो लम्हे उसकी हमसफ़र
इन यादों में छुपा सुकून ही, साथ निभाएगा मेरा हर डगर।
साथ निभाएगा मेरा, हर डगर।
The Tranquill Poet 🤍
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