इंतजार कर बैठे हम वक्त का,
यूँ सोचकर
कि हर ज़ख्म का वह मरहम ले आएगा।
हमें क्या पता था, हम कमबख्तों को
बदले ज़ख्म के
वक्त यूॅं ज़ख्म ही दे जाएगा।
अल्फाज़ तो फिर भी सिर्फ दिल तोड़ देते,
ख़ामोशियों ने
देखते ही देखते, कर दिया हमको जुदा।
बिछड़ना भी शायद इससे आसान था,
क्यूॅं है
इतना मुश्किल, यादों को कहना अलविदा?
हालात कभी यूँ भी होंगे, सोचा न था
कि लगेगा, अपने ही
दिल का आधा हिस्सा हमसे रूठ गया।
ये दूरियाँ इतनी भी बढ़ेंगी, सोचा न था
कि लगेगा, हमसे
हमारी रूह का ही साथ छूट गया।
एहसास हुआ ही नहीं कि हंसी भी, आँसू भी
सन्नाटे में घुल गए।
ऐसा भी क्या हुआ, कि हम खुद में खुद ही इतना खो गए?
नजदीकियाँ सारी मिट कैसे गईं, कि
उनसे दूर होके हम
खुद से ही इतना दूर हो गए?
अंधेरे में भटकता मुसाफ़िर क्या जाने
मंज़िल तो दूर
अगला क़दम भी कहां, कैसे मिलेगा।
पीछे मुड़के देखने को घर भी नहीं
या ख़ुदा! हमारे बाग़ में
सुकून का फूल आख़िर कब ही खिलेगा?
ना निभाना आसान है, ना भुलाना
रूठा है दिल इतना; कि
मनाने में लफ़्ज़ क्या ही काम आएंगे।
कल की यादों और आज की फ़र्यादों में
उलझे हुए कल को
क्या करके हम सुलझा पाएंगे?
कैसे समेटोगे यादों के सिक्कों को
अगर पड़ जाए
ख़ुशियों की गुल्लक पर दरार?
दर्द में भी सुकून जहाँ मिलता है
कभी कभी
दर्द भी वहीं से मिलता है, मेरे यार।
कोई तो बताओ, ज़िंदगी की क़ाया इतनी
कैसे पलट गई?
आख़िर कैसे हुआ ये, किसका कसूर था?
कि आज हमारा ग़म बनके रह गया वही
जो कभी हमारा
सुकून, हमारा ग़ुरूर था।
अपने तक़दीर की दास्तान भले ही न जाने
मगर फिर भी हम
वक्त में बेशक़ आस लगाएंगे;
जो बिखरे हैं आज, कभी तो समेट जाएंगे
टूटे हुए धागों में भी
किसी दिन गांठ बंध ही जाएंगे।
किसी दिन गांठ बंध ही जाएंगे।
- The Tranquill Poet 🤍
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