मैं शायद यह पन्ना फिर कभी खोलूँ ही नहीं,
पर आज खुद को यह चिट्ठी लिखे बगैर
रहा न गया।
कह डालूँगी इसमें वो सब कुछ, जो कहने की
तमन्ना थी, पर जो आज तक कभी मुझसे
कहा न गया।
बचपन की तस्वीरों से हटकर, कभी नजर
आईने पर पड़ती, तो मानो मैं
चौंक-सी जाती हूँ।
इतनी भी कैसे बदल गई मैं, कि आजकल
खुद से ही निगाहें बड़ी
मुश्किल से मिला पाती हूँ?
शीशे की दीवारों के बीच खुद को क़ैद कर,
पल-पल पत्थरों के डर से
मैं कांपती रहती हूँ।
फिर भी, काश कोई दरवाज़ा खटखटाए..
यूं सोचकर खिड़की से
झांकती रहती हूँ।
माँ का आँचल मिला नहीं, तो हर रात
तकिये की गोद पर सिर रखकर
सो जाती हूँ।
किस चीज़ की तलाश में, ये तो खुदा जाने,
मगर हर बार, खुद को ही
खो जाती हूँ।
जज़्बात तो दिल में भरे पड़े हैं, बस उन्हें
होंठों तक लाने में हिम्मत
टूट जाती है।
अल्फ़ाज़ काम के न रहे, सोचती हूँ रो दूँ,
लेकिन अफ़सोस - आँसू भी मुझसे
रूठ जाती हैं।
कोई पूछता है, "अपनों से दूर क्यों भागती हो?"
डर तो मुझसे उसी दूरी से है, तभी तो
मैं सिर्फ़ अकेलेपन का साथी हूँ।
यह मंज़ूरी है, मर्ज़ी नहीं। "और कभी तुम्हें-"
तो सन्नाटे को, खामोशी कहकर,
खुद को मनाती हूँ।
कुछ दिन ऐसे होते हैं, कि चाहे अंधेरा हो
चाहे सूनापन, अंदर की रोशनी तो
जगमगाती रहती है।
और फिर कुछ दिन ऐसे, कि सफर तय करना तो दूर,
उठने की हिम्मत जुटाते - जुटाते
कदमें डगमगा जाती हैं।
पिंजड़ा मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सका, कैद तो
तब हुई जब अपने ही पंखों का वज़न
उठाया नहीं गया।
खुद की नज़रों में आज नाकाबिल हूँ,
फिर भी, उड़ने का सपना उन्हीं नज़रों ने
मिटाया नहीं गया।
दुनिया की रंगों को देखकर, लगता है,
एक मैं ही क्यों ऐसी सफेद और
काली हूँ?
साजो-श्रृंगार में एक मुस्कुराहट पहनती
ज़रूर हूँ, पर अंदर झाँको, तो
बस खाली हूँ।
भीड़ों से डर लगता था, तो बचके अकेली रहती थी,
अब घुटन होने लगी खुद से है, आखिर
कहाँ में जाऊं?
कतराती अपने ही ख्यालों से हूँ, कोई तो
बताओ यारों, खुद को मेहफ़ूज़ी मैं
कैसे दिलाऊं?
दुनिया वालों की झोली, मुस्कानों से भर दूँ,
ऐसा बड़ा मन करता है मेरा
बार-बार।
शायद इसीलिए, कि अपने हिस्से के प्यार का,
मुझको आज तक रहा है,
सिर्फ़ इंतज़ार।
ये तो बस ऐंवई कुछ जज़्बात थे,
कुछ और हैं जिन्हें लफ़्ज़ों में लपेटना
बड़ा मुश्किल है।
छाप सबसे गहरा तो वही छोड़ते हैं,
समझ नहीं आता, आखिर क्या चीज़
ये दिल है?
सोचा था यह पन्ना दोबारा नहीं खोलूंगी,
बस आज यह चिट्ठी खुद को लिखे बगैर
मुझसे रहा न जाएगा।
मगर शायद कल इसका जवाब भी लिखूंगी -
वह सब कुछ, जो सुनने की तमन्ना है, पर
कभी कहा न जाएगा।
वह सब कुछ, जो प्यार से मेरे कानों में,
कभी कहा न जाएगा...
इति,
The Tranquill Poet 🤍
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